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बचपन की यादें

बचपन की यादें
बचपन की यादें


आज सुबह सुबह छत के किनारे पर बैठा था हल्की-हल्की ठंड हवाएं चल रही थी सूरज अपने लाले बीके रहा था पुनाली के बीच किनारे पर मैं बैठा दूर तक देख रहा था और देखते देखते हैं खो गया अपने बचपन की उन हसीन वादियों में कितने हसीन दिन थे वो गांव के मेरे वो छोटे-छोटे दोस्त और उनके साथ गांव की कच्ची सड़कों पर टायर न चाहते हुए रेस लगाना आम के दिनों में हमेशा जेब में नमक और ब्लेड लेकर घूमना और घर में हमेशा शरारत करना और मम्मी को हमेशा परेशान करना और जो चीज पसंद आया उसे रोकर पालना या रोने के बल पर अपने बात मनवा लेना पापा के कंधों पर घूमना मेले और बाजार में भैया के साथ जाना और उनके हाथ पकड़ कर घूमना वो छोटी दीदी की चोटिया खींचकर परेशान करना और छोटे भैया से हमेशा झगड़ना और घर में हमेशा  स्विच बोर्ड को टिक टिक करते रहना और उसे बीच में रोकने का प्रयास करना बारिश के दिनों में कागज की नाव बनाकर बहते पानी में रखना और उसे दूर तक देखते रहना और अपनी नाव के आगे निकल
जाने पर दोस्तों के साथ खुशियां दोस्तों के साथ खुशिया मनाना वो बचपन मैं मम्मी के द्वारा पकड़ के नहलाना और खाना खिलाना यह सब समय के साथ जिंदगी का कारवां आगे बढ़ता गया और बचपन की यादें सब पीछे छूटती गई आज इस बचपन की वादियों में खोए हुए मैं सोच रहा था कि कतने बेपरवाह थे वो दिन कितने लापरवाह थे वो दिन ना जितने की चिंता ना हारने का डर, वो समय वो पल वो जिंदगी जैसी भी थी पर हसके जीना जानते थे हम आज फिर से मैं बचपन की उन हसीन वादियो में खोना चाहते हैं और मम्मी की गोद में सर रखकर सोना चाहते हैं

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